नई दिल्ली। ग्रेटर नोएडा के एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा विश्वविद्यालय के छात्र को 5 लाख रुपये का कारण बताओ नोटिस थमाने पर देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने कड़ा रुख अपनाया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस प्रशासनिक मनमानी पर कड़ी नाराजगी जताते हुए उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई है।
शीर्ष अदालत ने सख्त लहजे में सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में ही छात्रों के खिलाफ सभी FIR रद्द करने और दंडात्मक कार्रवाई पर रोक का स्पष्ट आदेश दिया था, तो मजिस्ट्रेट ने उसकी अवहेलना करने का दुस्साहस कैसे किया?
‘मजिस्ट्रेट की हिम्मत कैसे हुई?’ – CJI की तीखी टिप्पणी
वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने इस संवेदनशील मामले को मौखिक उल्लेख (Oral Mentioning) के जरिए सीजेआई सूर्यकांत की पीठ के समक्ष उठाया।
सुनवाई के दौरान CJI ने सख्त तेवर दिखाते हुए कहा:
“एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकता है? हमने स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी छात्र के खिलाफ कोई जबरन कार्रवाई नहीं होगी। देश का कोई भी मजिस्ट्रेट सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नजरअंदाज नहीं कर सकता।”
“नोटिस वापस लेने से अवमानना खत्म नहीं होती”
सुनवाई के दौरान पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पूछा कि जब प्रशासन ने नोटिस वापस ले लिया है, तो क्या मामला खत्म नहीं हो जाता?
इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता भट्टाचार्य ने तीखा तर्क दिया कि:
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केवल नोटिस वापस ले लेने से अदालत के आदेश की अवमानना (Contempt of Court) खत्म नहीं हो जाती।
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यह शीर्ष अदालत की गरिमा और लोकतांत्रिक व्यवस्था का सीधा अपमान है।
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उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश के कुछ प्रशासनिक अधिकारी जानबूझकर छात्रों के बीच डर का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षत त्रिपाठी का पूरा मामला
यह पूरा मामला ग्रेटर नोएडा स्थित गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी (GBU) के सेकंड ईयर के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा हुआ है:
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पुलिस रिपोर्ट में क्या था आरोप?: 4 सितंबर 2026 को जारी पुलिस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अक्षत त्रिपाठी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में अन्य छात्रों को उकसा रहा था और सरकार विरोधी बातें फैला रहा था, जिससे शांति भंग होने का अंदेशा था।
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5 लाख के बॉन्ड की मांग: ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट तृतीय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126/135 के तहत कार्रवाई करते हुए छात्र को 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड भरने या कारण बताने का नोटिस थमा दिया था।
बैकफुट पर आया प्रशासन
सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों की अवहेलना उजागर होने और सीजेआई के सख्त रुख के डर से प्रशासन ने इस नोटिस को अमल में लाने से पहले ही हड़बड़ी में वापस ले लिया। हालांकि, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद अब प्रशासनिक कार्यप्रणाली और अदालती आदेशों के उल्लंघन पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
