नई दिल्ली: 4000 साल पुरानी मोहनजोदड़ो की मशहूर ‘डांसिंग गर्ल’ की कांस्य प्रतिमा, जिसे आज भी हम नेशनल म्यूजियम में बिना किसी बदलाव के देख सकते हैं, अचानक विवादों में है। यह मूर्ति दुनिया भर में अपनी अनोखी कला, उन्नत धातु विज्ञान और गजब के आत्मविश्वास के लिए जानी जाती है। लेकिन हाल ही में NCERT की एक नई किताब में इसे ‘ढककर’ छापा गया। सवाल उठता है कि क्या हम अपने ही इतिहास से इतना डरते हैं कि 4,000 साल पुरानी एक ऐतिहासिक प्रतिमा को भी कपड़े पहनाने पड़ रहे हैं?
यह वही मूर्ति है जो 1926 में मिली थी और जिसे दुनिया के बड़े-बड़े संग्रहालयों में जगह मिली है, लेकिन भारत की स्कूली किताब में यह ‘शालीनता’ और ‘उम्र के हिसाब से उपयुक्त’ न होने के नाम पर सेंसर हो गई। आइए जानते हैं इस मूर्ति का पूरा राज, NCERT ने ऐसा क्यों किया और इस पर इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा हुआ?
1926 में मिली थी ये अनमोल मूर्ति: क्यों है खास?
‘डांसिंग गर्ल’ (Dancing Girl) सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) की सबसे मशहूर और ऐतिहासिक कलाकृतियों में से एक है।
-
लंबाई और धातु: यह कांस्य (bronze) की बनी हुई है और सिर्फ 10.5 सेंटीमीटर लंबी है।
-
समय: माना जाता है कि यह करीब 2600 ईसा पूर्व (लगभग 4600 साल पुरानी) की है।
-
कहां मिली: साल 1926 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित मोहनजोदड़ो की खुदाई के दौरान यह पुरातत्वविदों को मिली थी।
-
बनावट और मुद्रा: यह एक किशोरी की मूर्ति है, जो एक हाथ कमर पर रखे खड़ी है, ठुड्डी थोड़ी ऊपर उठी हुई है और एक घुटना मुड़ा हुआ है। उसने बाल जूड़े में बांधे हैं और हाथ में चूड़ियां व गले में गहने पहने हुए हैं।
-
तकनीक: मूर्ति को ‘लॉस्ट-वैक्स तकनीक’ (Lost-Wax Technique) से बनाया गया था, जो साबित करता है कि उस दौर का धातु विज्ञान कितना उन्नत था। वर्तमान में यह मूर्ति दिल्ली के नेशनल म्यूजियम (National Museum, Delhi) में सुरक्षित रखी हुई है।
NCERT की किताब में क्या बदलाव किया गया?
कक्षा 9वीं की ‘मधुरिमा’ नाम की नई किताब के पहले चैप्टर ‘हिस्ट्री ऑफ आर्ट्स’ में इस मूर्ति की तस्वीर डाली गई। लेकिन इस तस्वीर में दो बड़े बदलाव देखने को मिले:
-
मूर्ति के खुले धड़ को डार्क शेडिंग (छाया) से पूरी तरह ढक दिया गया।
-
मूर्ति का मूल रंग भी बदल दिया गया।
यानी, किताब में छात्रों को एक ऐसी मूर्ति दिखाई गई, जो असल में दुनिया में कहीं मौजूद ही नहीं है। यह बात इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि पिछले 25 सालों से NCERT की किताबों में यह मूर्ति अपने मूल रूप में ही छपती आ रही थी और कभी इस पर कोई आपत्ति नहीं हुई।
NCERT ने इस करतूत की क्या वजह बताई?
जब यह मामला मीडिया में आया और हंगामा शुरू हुआ, तो NCERT के डायरेक्टर दिनेश प्रसाद सकलानी ने सफाई में कहा कि धड़ को ढकने की कोई खास वजह नहीं थी।
हालांकि, इस किताब को तैयार करने वाली समिति के प्रमुख और प्रसिद्ध इतिहासकार मिशेल डैनिनो ने एक बड़ा खुलासा किया। डैनिनो ने बताया कि उन्हें पहले आंतरिक रूप से सूचित किया गया था कि ‘डांसिंग गर्ल’ की मूर्ति को बच्चों की ‘उम्र के हिसाब से उपयुक्त (age-appropriate) नहीं’ माना गया था। हालांकि, डैनिनो और उनकी पूरी टीम ने इस तर्क से असहमति जताई थी।
इतिहासकारों और शिक्षाविदों ने क्यों किया तीखा विरोध?
इस बदलाव की देश भर के इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों ने जमकर आलोचना की:
-
इतिहास से छेड़छाड़ और नकली कलाकृति: मिशेल डैनिनो ने इसे सीधे तौर पर ‘सेंसरशिप’ करार दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह इतिहास की मूर्ति को बदलना ‘एक नकली कलाकृति बनाने’ के बराबर है। उन्होंने इसकी तुलना चर्च द्वारा माइकलएंजेलो की प्रसिद्ध मूर्ति ‘डेविड’ पर अंजीर के पत्ते चढ़ाने की रूढ़िवादी घटना से की।
-
‘पुरानी विक्टोरियन सोच’: डैनिनो ने तंज कसा कि नग्नता को हर जगह बुरा या अश्लील मानना एक ‘पुरानी विक्टोरियन (ब्रिटिश कालीन) सोच’ है। जब हम देश की शिक्षा व्यवस्था और मूल ढांचे में बड़े बदलाव की बात कर रहे हैं, तो ऐसी संकीर्ण सोच उसके बिल्कुल खिलाफ है।
-
छात्रों की बुद्धि पर अविश्वास: विशेषज्ञों का कहना है कि ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डांसिंग गर्ल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वह शालीनता के किसी थोपे गए मापदंड पर खरी उतरती है या नहीं, बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह प्राचीन भारत की स्त्री के आत्मविश्वास, संतुलन और एक सशक्त उपस्थिति को दर्शाती है। शिक्षा का काम युवाओं को सच से रूबरू कराना है, न कि उनसे सच छिपाना।
भारी विवाद के बाद बैकफुट पर आया NCERT
चारों तरफ से घिरने और भारी विरोध के बाद आखिरकार NCERT को अपना फैसला बदलना पड़ा:
-
डिजिटल वर्जन में सुधार: NCERT के डायरेक्टर दिनेश सकलानी ने घोषणा की कि किताब के ऑनलाइन (डिजिटल) वर्जन में तुरंत पुरानी और वास्तविक तस्वीर को बहाल कर दिया गया है।
-
प्रिंट एडिशन में भी बदलाव: उन्होंने भरोसा दिलाया कि आने वाले समय में जो भी किताबें प्रिंट होकर आएंगी, उनमें भी असली और बिना छेड़छाड़ वाली तस्वीर ही छापी जाएगी।
यह पहली बार नहीं है…
दिलचस्प बात यह है कि साल 2023 में भी ‘डांसिंग गर्ल’ को लेकर ऐसा ही एक प्रयास हुआ था। तब संस्कृति मंत्रालय के एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में ‘डांसिंग गर्ल’ को शुभंकर (Mascot) बनाया गया था, लेकिन वहां भी उसे गुलाबी रंग का ब्लाउज और पीली स्कर्ट पहना कर पेश किया गया था। यानी, कलाकृति को ‘आधुनिक रूढ़िवादी चश्मे’ से देखने की कोशिश पहले भी हो चुकी है।
