15 अगस्त विशेष: छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी शहीद वीर नारायण सिंह, जिन्होंने अकाल में जमाखोरों से अनाज छीन प्रजा में बांट दिया था

15 अगस्त विशेष:

रायपुर: 15 अगस्त का दिन न केवल तिरंगा फहराने का अवसर है, बल्कि उन अमर बलिदानियों को नमन करने का दिन भी है जिन्होंने देश की माटी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। जब भी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और छत्तीसगढ़ की क्रांति का ज़िक्र होता है, तब सोनाखान के वीर सपूत शहीद वीर नारायण सिंह का नाम सबसे पहले आता है।

छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माने जाने वाले वीर नारायण सिंह की जीवनगाथा साहस, जनसेवा और सर्वोच्च बलिदान का बेमिसाल प्रतीक है।

नरभक्षी शेर से मुकाबला: ऐसे नाम के आगे जुड़ा ‘वीर’

बलौदाबाजार के सोनाखान (प्राचीन नाम सिंघगढ़) रियासत के युवराज नारायण सिंह हमेशा अपनी प्रजा के सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे। एक समय जब पूरे इलाके में नरभक्षी शेर का आतंक था, तब युवराज ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए केवल तलवार के बल पर शेर का शिकार किया। इस बहादुरी के बाद प्रजा उन्हें ‘वीर’ नारायण सिंह के नाम से पुकारने लगी।

1856 का अकाल और जमाखोरों के खिलाफ बगावत

साल 1856 में जब क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा, तो भुखमरी से तड़पती प्रजा की मदद के लिए वीर नारायण सिंह ने कसडोल के व्यापारी/जमाखोरों के गोदाम खोल दिए और सारा अनाज दाने-दाने को तरस रहे ग्रामीणों में बांट दिया।

अंग्रेजी हुकूमत के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर इलियट को जब इसकी शिकायत मिली, तो अंग्रेजों ने इसे अपराध मानकर कार्रवाई शुरू कर दी। इसके बाद वीर नारायण सिंह ने ‘कुर्रूपाट डोंगरी’ को अपना आश्रय बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का बिगुल बजा दिया।

जयस्तंभ चौक: तोप से उड़ाया गया था अमर बलिदानी का पार्थिव शरीर

10 दिसंबर 1857—यह छत्तीसगढ़ के इतिहास की सबसे भावुक और ऐतिहासिक तारीख है। रायपुर के वर्तमान जयस्तंभ चौक पर अंग्रेजों ने वीर नारायण सिंह को फांसी दे दी। इतना ही नहीं, क्रांति का खौफ जनता के दिलों में बैठाने के लिए उनके पार्थिव शरीर को तोप से उड़ा दिया गया था।

राज्य सरकार का सम्मान और 2 लाख रुपये का पुरस्कार

छत्तीसगढ़ सरकार के आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा उनकी स्मृति में ‘शहीद वीर नारायण सिंह पुरस्कार’ स्थापित किया गया है।

  • क्षेत्र: अनुसूचित जनजातियों में सामाजिक चेतना और उत्थान के उत्कृष्ट कार्य।

  • सम्मान राशि: ₹2 लाख नकद और प्रशस्ति पत्र।

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