Chhattisgarh Bilaspur News: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों से जुड़ी एक अहम याचिका पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि विभाग की गलती से गलत वेतन निर्धारण के कारण कर्मचारी को अतिरिक्त राशि का भुगतान हुआ है, तो हर परिस्थिति में उस राशि की वसूली नहीं की जा सकती। खास तौर पर वर्ग-3 और वर्ग-4 के कर्मचारियों से ऐसी वसूली को लेकर सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का पालन करना होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी ने राशि लौटाने के लिए सहमति पत्र या शपथपत्र दिया हो, केवल इस आधार पर वसूली को वैध नहीं माना जा सकता।
यह फैसला जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने एक रिटायर उप निरीक्षक की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। याचिकाकर्ता ने विभाग द्वारा गलत वेतन निर्धारण के आधार पर उससे वसूल की गई 6 लाख 26 हजार 104 रुपये की राशि वापस करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि अतिरिक्त भुगतान उसकी किसी गलती, धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने या किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाने के कारण नहीं हुआ था। विभाग ने स्वयं उसके वेतन का गलत निर्धारण किया था। इसके बावजूद रिटायरमेंट के समय उससे 6.26 लाख रुपये की राशि जमा करा ली गई।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले बकाया लाभों को रोकने की बात कहकर उस पर राशि वापस करने के लिए दबाव बनाया गया और उससे सहमति पत्र लिया गया। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने वसूली का बचाव करते हुए कहा कि कर्मचारी ने स्वयं सहमति पत्र देकर अतिरिक्त भुगतान की राशि वापस करने पर सहमति जताई थी।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता वर्ग-3 के पद पर कार्यरत था और अतिरिक्त राशि का भुगतान केवल विभाग की ओर से किए गए गलत वेतन निर्धारण के कारण हुआ था। सरकार की ओर से ऐसा कोई प्रमाण पेश नहीं किया गया कि कर्मचारी ने धोखाधड़ी की, गलत जानकारी दी या किसी तथ्य को छिपाकर अतिरिक्त राशि हासिल की।
अदालत ने यह भी कहा कि कर्मचारी की ओर से दिया गया सहमति पत्र हर स्थिति में स्वैच्छिक नहीं माना जा सकता। विशेष परिस्थितियों में कर्मचारी पर दबाव बनाया जा सकता है। इस मामले में भी याचिकाकर्ता ने सेवानिवृत्ति लाभ रोके जाने की आशंका के चलते सहमति देने की बात कही थी।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि वर्ग-3 या वर्ग-4 के कर्मचारी को अतिरिक्त भुगतान विभाग की गलती के कारण हुआ है और कर्मचारी की ओर से कोई धोखाधड़ी या गलत बयानी नहीं की गई है, तो सामान्य परिस्थितियों में उस राशि की वसूली नहीं की जा सकती। केवल सहमति पत्र या शपथपत्र के आधार पर भी ऐसी वसूली को सही नहीं ठहराया जा सकता।
इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने रिटायर उप निरीक्षक से वसूल की गई 6 लाख 26 हजार 104 रुपये की राशि के मामले में उन्हें राहत दी है। अदालत के इस निर्णय को विभागीय वेतन निर्धारण की गलती से प्रभावित कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
