Chhattisgarh Bilaspur News: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ शिक्षक पात्रता परीक्षा (CG-TET) 2024 की फाइनल आंसर-की में हटाए गए सवालों को दोबारा शामिल करने की मांग को लेकर दायर याचिकाओं को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने कहा कि परीक्षा और अकादमिक मूल्यांकन के मामलों में अदालतें विशेषज्ञों की राय में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, जब तक संबंधित निर्णय स्पष्ट रूप से मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या कानून के विपरीत साबित न हो।
दरअसल, CG-TET 2024 की फाइनल आंसर-की में सेट-A के प्रश्न क्रमांक 56, सेट-B के प्रश्न क्रमांक 55 और सेट-C व D के प्रश्न क्रमांक 57 को हटा दिया गया था। इस फैसले के कारण कई अभ्यर्थियों के अंक 74.5 से 74.9 के बीच रह गए, जबकि OBC, SC और ST वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम पात्रता अंक 75 निर्धारित थे। करीब 20 अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि परीक्षा निर्देशों के मुताबिक इन प्रश्नों को रद्द नहीं किया जा सकता और मॉडल आंसर-की के आधार पर वे पात्रता अंक हासिल कर चुके थे।
सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ व्यापमं की ओर से बताया गया कि विवादित प्रश्न एक ही गद्यांश पर आधारित थे। परीक्षा के कुछ सेट में प्रिंटिंग की गलती के कारण गद्यांश और उससे संबंधित प्रश्न सही क्रम में नहीं थे। इसके चलते अभ्यर्थियों को गद्यांश उपलब्ध होने से पहले ही उससे जुड़े सवाल हल करने की स्थिति बन गई थी।
व्यापमं ने बताया कि इस मामले को विषय विशेषज्ञों की समिति के सामने रखा गया था। समिति ने सभी सेट में संबंधित प्रश्नों को हटाने की सिफारिश की, ताकि सभी अभ्यर्थियों के साथ समान व्यवहार किया जा सके। हटाए गए सवालों के अंक परीक्षा निर्देशों में निर्धारित फार्मूले के अनुसार सभी अभ्यर्थियों को समान रूप से दिए गए थे।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और मामले की परिस्थितियों का अवलोकन करने के बाद माना कि सवाल हटाने का फैसला बिना विचार किए नहीं लिया गया था। अदालत ने कहा कि प्रोविजनल या मॉडल आंसर-की के आधार पर पात्रता अंक हासिल कर लेने मात्र से अभ्यर्थी का कोई कानूनी अधिकार नहीं बन जाता। अंतिम परिणाम फाइनल आंसर-की के आधार पर तैयार किया जाता है और इस मामले में फाइनल आंसर-की आपत्तियों तथा विशेषज्ञों की राय पर विचार करने के बाद जारी की गई थी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विशेषज्ञों द्वारा लिए गए अकादमिक निर्णय में न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित है। चूंकि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि प्रश्न हटाने का निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या कानून के खिलाफ था, इसलिए हाईकोर्ट ने सभी संबंधित याचिकाओं को खारिज कर दिया।
