CG Naxal Victim Policy: छत्तीसगढ़ में कागजों तक सिमटी नक्सल पीड़ित पुनर्वास नीति; 120 दिन का नियम फेल, अब रायपुर कूच करेंगे पीड़ित

CG Naxal Victim Policy:

रायपुर/बस्तर: छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा का दंश झेल चुके पीड़ित परिवारों के जख्मों पर प्रशासनिक लापरवाही का नमक छिड़का जा रहा है। शासन द्वारा बड़े दावों के साथ बनाई गई “नक्सलवादी आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत पुनर्वास नीति-2025” जमीनी स्तर पर सिर्फ कागजों और दफ्तर की फाइलों तक सीमित रह गई है। आलम यह है कि नियमों के मुताबिक जिस पुनर्वास प्रक्रिया को 120 दिनों के भीतर पूरा हो जाना चाहिए था, उसके लिए पीड़ित परिवार महीनों से दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

हाल ही में 10 जून 2026 को हुई उच्च स्तरीय पुनर्वास समिति की बैठक के बाद भी पीड़ितों को खाली हाथ लौटना पड़ा, जिसके बाद अब इन परिवारों का सब्र पूरी तरह जवाब दे चुका है।

 120 दिनों की समय-सीमा फेल, फाइलों में अटकी जिंदगी

पुनर्वास नीति के कड़े प्रावधानों के अनुसार, किसी भी पीड़ित परिवार के आवेदन पर 120 दिनों (4 महीने) के भीतर पुनर्वास का अंतिम फैसला लेना अनिवार्य है। इस मामले में पुलिस विभाग ने तत्परता दिखाते हुए अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी थी, जिसके बाद आईजी (IG) स्तर से संबंधित कलेक्टर को बकायदा अनुशंसा पत्र भी भेजा जा चुका है। इसके बावजूद, स्थानीय प्रशासन और पुनर्वास समिति के ढुलमुल रवैये के कारण अंतिम निर्णय के नाम पर नतीजा अब तक पूरी तरह शून्य रहा है।

 “बैठकें बहुत हुईं, इंसाफ एक भी नहीं” — पीड़ितों का दर्द

नक्सल पीड़ित धीरेन्द्र साहू ने बताया कि 10 जून 2026 को पुनर्वास समिति की एक महत्वपूर्ण मीटिंग रखी गई थी। इस बैठक से पीड़ित परिवारों को बड़ी उम्मीदें थीं, और उन्होंने नीति के तहत अपने वैध अधिकार समिति के सामने रखे। लेकिन पूरी चर्चा के बाद भी समिति एक भी ठोस फैसला नहीं ले सकी।

पीड़ितों का सीधा सवाल है कि जब हमारी पीड़ा को देखकर शासन ने खुद नीति तय की है, तो फिर नौकरशाही (Bureaucracy) अंतिम फैसला लेने में इतनी लंबी प्रतीक्षा क्यों करवा रही है? यह उन परिवारों के आत्मसम्मान और आजीविका से जुड़ा है जिन्होंने देश के लिए अपनी जमीन, घर और अपनों को खोया है।

 पीड़ित परिवारों की 3 प्रमुख मांगें:

पीड़ितों का कहना है कि उनकी मांगें नीति के प्रावधानों के तहत बेहद स्पष्ट और जायज हैं:

  1. सरकारी नौकरी: नीति के तहत पीड़ित परिवार के सदस्य को सरकारी नौकरी (या उसके एवज में तय सहायता राशि) दी जाए।

  2. आवासीय भूमि: शहरी या ग्रामीण क्षेत्र में गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए आवासीय जमीन आवंटित हो।

  3. केंद्रीय फंड: नीति के तहत मिलने वाली केंद्रीय सहायता राशि का तुरंत भुगतान किया जाए।

आर-पार की लड़ाई: अब सीधे रायपुर में सीएम से गुहार, बड़े आंदोलन की तैयारी

स्थानीय प्रशासन और समिति की इस घोर संवेदनहीनता से निराश होकर अब इन पीड़ित परिवारों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। पीड़ितों ने साफ कर दिया है कि वे जल्द ही राजधानी रायपुर का रुख करेंगे और सीधे मुख्यमंत्री व उच्चाधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखेंगे। यदि फिर भी न्याय नहीं मिला, तो एक बड़े उग्र आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जा रही है।

अगर समय रहते प्रशासनिक अमला नहीं जागा, तो यह सरकार की पुनर्वास नीतियों और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर एक कभी न मिटने वाला बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर देगा।

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