बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अधिकारों (Maternity Rights) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि मातृत्व लाभ का अधिकार सिर्फ नियमित सरकारी कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। यह लाभ दैनिक वेतनभोगी, मस्टर रोल, संविदा (Contractual) और कॉलेजों में कार्यरत अतिथि व्याख्याताओं (Guest Lecturers) को भी समान रूप से मिलेगा।
क्या है पूरा मामला? यह पूरा मामला रायपुर के शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ कॉलेज से जुड़ा है। यहां नवंबर 2022 से अतिथि व्याख्याता के रूप में कार्यरत शिल्पी शुक्ला ने अपनी गर्भावस्था के दौरान 13 सितंबर 2025 से मातृत्व अवकाश लिया था। वे अपनी छुट्टी पूरी कर 20 मार्च 2026 को वापस ड्यूटी पर लौट आईं। इसके बाद जब उन्होंने नियमानुसार अपने अवकाश अवधि के वेतन (Maternity Leave Salary) के लिए आवेदन किया, तो उच्च शिक्षा विभाग ने उन्हें ‘अतिथि कर्मचारी’ बताते हुए भुगतान करने से साफ इन्कार कर दिया। विभाग के इस फैसले को शिल्पी शुक्ला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
भेदभाव करना गैरकानूनी और अमानवीय: हाईकोर्ट हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ता नियमित कर्मचारी नहीं हैं, इसलिए वे वित्तीय लाभ की पात्र नहीं हैं। इसके विपरीत, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने ऐतिहासिक फैसले (महिला मस्टर रोल कर्मचारी मामला) का हवाला देते हुए दमदार तर्क दिया। उन्होंने कहा कि मातृत्व लाभ एक मानवीय और वैधानिक अधिकार है, जिसे केवल नियुक्ति के स्वरूप या सेवा श्रेणी के आधार पर किसी महिला से छीना नहीं जा सकता।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जब याचिकाकर्ता एक नियमित व्याख्याता की तरह ही अपने सभी शैक्षणिक दायित्वों को पूरा कर रही थीं, तो केवल ‘अतिथि’ होने के आधार पर उनका मातृत्व अवकाश का वेतन रोकना पूरी तरह गैरकानूनी और अमानवीय है।
उच्च शिक्षा विभाग को 3 महीने का अल्टीमेटम हाईकोर्ट ने इस भेदभाव को खारिज करते हुए उच्च शिक्षा विभाग को कड़ा निर्देश दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता महिला को उनके मातृत्व अवकाश की अवधि का पूरा बकाया वेतन तीन महीने के भीतर अनिवार्य रूप से भुगतान किया जाए। इस फैसले के बाद प्रदेश की हजारों संविदा, मस्टर रोल और अतिथि महिला कर्मचारियों में न्याय की नई उम्मीद जगी है।
