रायपुर/जगदलपुर। बहुचर्चित झीरम घाटी नरसंहार मामले में जगदलपुर स्थित एनआईए (NIA) की विशेष अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें और सुनवाई पूरी होने के बाद 31 अगस्त को फैसला आने की संभावना थी। हालांकि, एनआईए विशेष कोर्ट ने फैसले की तारीख को आगे बढ़ाते हुए अब 5 सितंबर 2026 को अंतिम फैसला सुनाने का निर्णय लिया है।
भूपेश बघेल ने एनआईए जांच और भाजपा पर दागे सवाल
अदालत का फैसला आने से पहले ही प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एनआईए की जांच प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच के दौरान एफआईआर में नामजद मुख्य षड्यंत्रकारियों और आरोपियों से न तो पूछताछ की गई और न ही मौके पर मौजूद कई अहम प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए गए।
बघेल ने कहा कि अपने कार्यकाल में उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री से जांच राज्य सरकार की एसआईटी (SIT) को सौंपने का अनुरोध किया था, लेकिन एनआईए इसके खिलाफ हाईकोर्ट चली गई। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान राज्य सरकार भी इस षड्यंत्र के पीछे छिपे चेहरों को बेनकाब करने में कोई रुचि नहीं दिखा रही है, जिससे प्रतीत होता है कि मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
टीएस सिंहदेव ने सुरक्षा और साक्ष्यों पर जताई चिंता
इससे पूर्व, प्रदेश के पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने भी घटना की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे सिंहदेव ने बताया कि वे जगदलपुर जाकर एनआईए के समक्ष अपना बयान दर्ज करा चुके हैं।
उन्होंने कहा कि घटना वाले दिन उस मार्ग पर पुलिस की उपस्थिति नगण्य थी और सुरक्षा बल तैनात नहीं थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि पीड़ितों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को वास्तविक न्याय तभी मिलेगा, जब अदालत जांच की इन गंभीर चूकों का संज्ञान लेकर अंतिम षड्यंत्रकारियों की जवाबदेही तय करेगी।
क्या था झीरम घाटी नरसंहार?
25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के मद्देनजर निकाली जा रही कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ सुकमा से जगदलपुर लौट रही थी। इसी दौरान दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी में नक्सलियों ने घात लगाकर कांग्रेस नेताओं के काफिले पर भीषण हमला कर दिया था।
इस भयावह नक्सली हमले में कांग्रेस की एक पूरी शीर्ष पीढ़ी समाप्त हो गई थी। इसमें ‘बस्तर टाइगर’ नाम से मशहूर महेंद्र कर्मा, तत्काली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल और उदय मुदलियार सहित 27 से अधिक नेताओं, कार्यकर्ताओं, जवानों और आम नागरिकों की जान चली गई थी।
